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मधु तुम हाला हो मधुरतम ,मधुशाला की ,मधु तुम यौवन रस का छलकता प्याला !
मधु तुम्हारा यौवन रस पीने को , बेताब और बेचेन लग रहा सारा जहाँ मतवाला !!
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सारे जग को बनाया दिवाना तुमने , यौवन के छलकते जाम का !
हमको भी अपना दीवाना बना लो , सागर मय से जाम पिलाकर !!
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बेताबी अब बढ़ती जा रही है ,मंजिल असंभव नज़र आ रही है I
जितना प्रयास पथिक है करता , प्यास बढ़ती ही जा रही है !!
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मधु आओ बैठो पास मेरे तुम ,अपने अधरों से जाम पिलादो !
अपनी महक से जीवन महकाकर ,अपना यौवन नाम मेरे कर दो !!
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एक पल नहीं ,एक दिन नहीं ,एक बरस नहीं ,सौ साल नहीं !
जनम -जनम का साथ तुम लिख दो ,मधुशाला तुम नाम मेरे लिख दो !!
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