Sunday, December 9, 2012

मेरी प्यारी सुरबाला ,रोज ही अपनी सागरमय से

आपको नित्य ही आना होगा इंटरनेट की पावन मधुशाला

 मै पथिक अंजान राहों का
 मधुशाला भाग 2 इंटरनेट के माध्यम
 से आप तक (प्रिय पाठको )पहुंचा रहा हूँ
 आप को अवश्य ही पसंद आएगी
 इस आशा के साथ !
603अ
आपके पास टुकड़ो में एक -एक एक-पैग करके ,
मेरी प्यारी सुरबाला ,रोज ही अपनी सागरमय से
टपकाएगी दिव्य अनुपम अमृत रूपी हाला ,
आपको नित्य ही आना होगा इंटरनेट की पावन मधुशाला 
 603
आओं चलो चले मधुशाला ,यारो बैठ कर पियेंगे सुमधुर हाला !
सारे जहाँ के गम हवा हो जायेंगे ,जब सोमरस के चार पैग अंदर जायेंगे 

No comments:

Post a Comment